Wednesday, 20 May 2020

Ayurveda Questions And Answers In Hindi

Ayurveda Questions And Answers In Hindi


Q:- शूल प्रशमन महाकषाय में कौन सा द्रव्य वर्णित है? Which among the following drug is mentioned in shoolprashmana mahakashaya?


  • पुनर्नवा Punarnava
  • एरण्ड Eranda
  • गण्डीर Gandeer
  • तिंदुक Tinduka

Q:- अष्टांगहृदय के अनुसार हेमंत ऋतु में कौन सा रस बलवान होता है? Which rasa is balawana in hemant ritu according to ashtang hridyam?


  • अम्ल Amla
  • मधुर Madhura
  • लवण Lavana
  • कटु Katu

Q:- नित्यग, अनुबंध किसके पर्याय हैं? Nityaga and anubandha are synonym of which among the following?


  • आत्मा Aatma
  • मन Man
  • प्रमाण Pramana
  • आयु Aayu

Q:- मूल सिरा कितनी होती हैं? Number of moola sira?


  • 30
  • 40
  • 50
  • 60

Q:- Wrist drop occurs due to palsy of?


  • Median nerve
  • Ulnar nerve
  • Radial nerve
  • Musculocutaneous nerve

Q:- आर्द्र पिप्पली का रस ? Rasa of aadra pippali ?


  • मधुर Madhura
  • कटु Katu
  • तिक्त Tikta
  • कषाय Kashay

Q:- Which among the following is known as " iceberg disease"?


  • Cancer
  • Diabetes
  • Coronary Heart Disease
  • None of the above

Q:- Scalds occur due to?


  • Electric burn
  • Dry heat
  • Moist heat
  • Lightening

Q:- पक्ष्मकोप व्याधि है? Pakshmakopa vyadhi is?


  • साध्य Sadhya
  • कष्टसाध्य Kashtsadhya
  • असाध्य Asadhya
  • याप्य Yapya

Q:- काश्यप संहिता में कुल कितने स्थान हैं? How many sthana are there in kashyap samhita?


  • 6
  • 7
  • 8
  • 9

Tuesday, 19 May 2020

Charak Nidan चरक निदान Question and Answers- Ayurveda Quiz

Charak Nidan चरक निदान Question and Answers- Ayurveda Quiz in Hindi


Q:-बहोशच प्रमाण जिज्ञासा किस व्याधि का पुर्वरुप है।


  • उन्माद
  • अपस्मार
  • राज यक्ष्मा
  • मोह


Q:-तिलपीडकचक्रधिरोहीणं वातकुण्डलिकाभि चोन्मथन। किस व्याधि के लिए कहा गया है


  • राज यक्ष्मा
  • उन्माद
  • अपस्मार
  • Koi nahi

Q:-Gulm के स्थान हैं -Sthana of Gulma


  • नाभि
  • पार्श्व
  • हिर्दया
  • सभी


Q:-नैव देवा न गन्धर्वा न पिशाचा न राक्षसा:' किस अध्याय का सन्दर्भ है"Naiva devā na gandharvā na pishāchā na rākshasāh" find the correct reference


  • चरक निदान 5
  • चरक निदान 6
  • चरक निदान 7
  • चरक निदान 8

Q:-चक्रपाणि के अनुसार उपशय कितने प्रकार का होता है।


  • 6
  • 12
  • 18
  • 20

Q:-चरक के अनुसार राज यक्ष्मा एकादश रूप में नहीं है


  • श्वास
  • श्लेष्मछद्रन
  • शोणितष्ठीवन
  • रंक्तवमन

Q:-रक्तपित्त की व्याधि का निदानर्थकर रोग है


  • गुल्म
  • सोथ
  • ज्वर
  • कास

Q:-आहार का परम धाम होता है


  • रस
  • रक्त
  • शुक्र
  • सभी

Q:-अवकुंजतम किस अपस्मार का लक्षण है


  • वताज
  • P
  • K
  • S

Q:-गृध्नुमभ्यवहार्येषु ......नीडद्रुममिवाण्डज:" किस रोग की उपमा दी गयी है"gridhnumabhyavahaaryeshu....needadrumamivaandajah" which disease is analogous to it


  • ज्वर
  • अपसमर
  • प्रमेह
  • उन्माद

Q:-निम्न में किस कुष्ठ में कृमि पाए जाते है


  • कपाल
  • Udumabar
  • मंडल
  • सभी

Q:-आचार्य चरक के अनुसार फेन का अधिक मात्रा मे निकलना ( उद्वमन्तं फेनं ) किस अपस्मार का लक्षण है ?Acc. to Acharya Charak Excessive froth coming out of mouth is symptom of which अपस्मार


  • V
  • P
  • K
  • S

Q:-चरक के अनुसार कुष्ठ भेद है


  • सप्त
  • 18
  • असंख्य
  • सभी

Q:-योगक्षेमकरेषु प्रयतेत विशेषण - का उल्लेख कौन से आयतन जन्य शोष में है ‌।


  • साहस जन्य
  • संधारण जन्य
  • क्षय जन्य
  • विष्माशन जन्य

Q:-पंतनान्यगंवयवाना कुष्ठ का................है।


  • पुर्वरूपा
  • उपद्रव
  • लक्षण
  • सभी

Q:-उदर्द निम्न में से किस व्याधि का पूर्वरूप है ?Udarda is the pūrvarūpa of which of the following disease ?


  • उन्माद
  • अपस्मार
  • अतत्वाभी निवेश
  • मद

Q:-चरकानुसार सभी भावों को छोड़कर किसका अनुपालन करना चाहिएAccording to charaka, leaving everything else what should be maintained?


  • आयुर्वेद
  • सत्व
  • शरीर
  • सभी

Q:-अर्दीतआकृतिकारण च व्याधे । किस व्याधि का पुर्वरूप है।


  • उन्मद
  • अपस्मार
  • Rajyakshma
  • ज्वर

Q:-चरकसंहिता में अपस्मार के कुल कितने भेद बताए गए है


  • 1
  • 2
  • 3
  • 4

Q:-मसिवर्ण किस प्रमेह का स्वरूप है"Masivarna" urine appears in which type of prameha?


  • क्षार मेह
  • काल मेह
  • नील मेह
  • हरिद्रा मेह

Q:-अभीक्ष्णमपस्मरन्तम्' किस अपस्मार का लक्षण है"abhikshanamapasmarantama" is symptom of which type of apasmaara?


  • V
  • P
  • Both
  • K

Q:-बहुबहलरक्तपुयलासिकानी। किस कुष्ठ का लक्षण है


  • कपाल
  • उदुंबर
  • मंडल
  • पुंडरीक
  • Other:

Q:-अनूपशय का अंतर भाव किया जाता है।


  • निदान
  • पुरवारूपा
  • रूप
  • सम्प्रप्ती

Q:-आचार्य चरक के अनुसार अपस्मार व्याधि मे बीभत्स चेष्ठा युक्त होना और अंधकार में डूबने जैसा होना किस के विभ्रम से होता है?Acc. to Acharya Charak , Bibhatsa cheshtā and getting lost in darkness in apasmāra vyādhi is due to vibhrama of ?


  • स्मृति के
  • मन्न के
  • बुद्धि के
  • सभी

Q:-आचार्य चरक के अनुसार निम्नलिखित मे से किस प्रयोजन वाला भूतो उन्माद साध्य होता है?Acc. to Acharya Charak Bhūta Unmāda due to which the following prayojana is considered sādhya ?


  • हिंसा
  • रति
  • अभयरचन
  • B and c

Q:-Gulm में प्रधान दोष कौन सा है -Pradhāna Dosha in Gulma...


  • V
  • P
  • K
  • S

Q:-पित्तज प्रमेह हैPittaja prameha is -


  • काल मेह
  • शुक्ल मेह
  • शिकता मेह
  • शुक्र मेह

Q:-........... पुन स्मृतिबुद्धिसत्व संप्लवा वीभत्सचेष्टाअवस्थिकाम तम प्रवेश ।

  • रज्यक्षमा
  • मद
  • उन्माद
  • अपस्मार

Q:-6- भूतो उन्माद के कारण में कितने आयतन है।


  • 1
  • 3
  • 4
  • 6

Q:-आचार्य चरक के अनुसार उन्माद मे दोष कौन से स्त्रोत्स को आवृत करते है?Acc. to Acharya Charak Which Srotasa Āvarana occurs by dosha on.Unmāda ?


  • मनो वह
  • रस वह
  • रक्त वह
  • All

Q:-प्रत्याख्येय अपस्मार हैWhich type of apasmaara is pratyaakhyeya?


  • V
  • P
  • K
  • S

Q:-हिताशी स्यान्मिताशी स्यात्कालभोजी जितेन्द्रियः ....." इस श्लोक का रेफेरेंस बताये ।"Hitāshī syānmitāshī syātkālabhojī jitendriyah ......... " the reference of this shloka is -


  • चरक निदान 7
  • चरक निदान 8
  • चरक निदान 5
  • चरक निदान 6

Q:-रहस्कामता किस उन्माद का लक्षण हैRahaskāmatā is symptom of which Unmāda


  • V
  • P
  • K
  • S

Q:-भस्म मेह का वर्ण न किस आचार्य ने किया है


  • भेल
  • चरक
  • सुश्रुत

Q:-बीभत्सदर्शनता चास्य काये" किस व्याधि का पूर्वरूप है"beebhatsadarshanataa chaasya kaaye" is premonitory symptom of which disease?


  • उन्माद
  • अपस्मार
  • शोष
  • सभी

Q:-निम्न में से कौन सी व्याधि का कोई दुष्य नहीं होता है


  • ज्वर
  • रक्तपित्त
  • गुल्म
  • प्रमेह

Q:-मृजाव्ययामवर्जनं" किस व्याधि का सामान्य निदान है"mrijaavyaayaamvarjanam" is nidaana of which type of disease?


  • प्रमेह
  • गुल्म
  • ज्वर
  • रक्तपित्त

Q:-प्राचीन काल में दक्ष प्रजापति के यज्ञ विध्वंस के समय भय,त्रास,शोक से किस व्याधि की उत्पत्ति हुईDuring the ancient times, what diseases was created due to fear, suffering and sadness during the Yajna Vidhvansa of Daksha Prajapati?


  • रक्तपित्त
  • उन्माद
  • अपस्मार
  • गुल्म

Q:-व्याधि संकर का वर्णन किस आचार्य ने सर्व प्रथम किया है।


  • चरक
  • सुश्रुत
  • वागभट
  • चक्रपाणि

Q:-आस्फालयन्तं भूमिं" किस अपस्मार का लक्षण है"aasfaalyantam bhumim" is symptom of which type of apasmaara?


  • V
  • P
  • K
  • S

Q:-घर्मान्त किस ऋतु का prayayy है


  • शरद
  • बंसंत
  • ग्रीष्म
  • वर्षा

Q:-दोषों की तर तम उपलब्धि किस संप्राप्ति के अन्तर्गत आती है


  • संख्या
  • प्रधान
  • विधि
  • विकल्प

Q:-प्रमेह दुष्य में किस धातु का अंतर्भाव नहीं होता है ?Which dhātu is not included in the dūshya of prameha ?


  • रस
  • रक्त
  • अस्थि
  • मांस

Q:-हविष्प्राश से कौनसी व्याधि होती है ?Which disease occurs due to havishprāsha ?


  • प्रमेह
  • कुष्ठ
  • दोनों
  • गुल्म

Q:-उर्धवाग रक्तपित्त में कौन सी प्रधान औषधियो से विरेचन करते है।


  • कषाय and tikta
  • कटु
  • मधुर
  • Koi nahi

Q:-रक्तपित्त को लोहित पित संज्ञा किसने दी है


  • चरक
  • Shushrut
  • वागभट्ट
  • माधव

Q:-राज यक्ष्मा के आयतन कितने है


  • 3
  • 4
  • 5
  • 11

Q:-कास का निदानार्थकर रोग है (चरकानुसार)According to charaka, nidaanaarthakara roga of kaasa is


  • क्षय
  • प्रतिशायाय
  • श्वास
  • हिक्का

Q:-चरक ने निदान स्थान के किस अध्याय में रोगों की साध्यासाध्यता का वर्णन किया हैCharak has described the saadhyaasaadhyataa of the diseases in which chapter of the nidaana sthaana?


  • 5
  • 6
  • 7
  • 8

Q:-प्रयोगापरिशुद्धत्वात् एवं अन्योन्यसंभावात्' किसके हेतु है"prayogaaparishuddhatvaata evum anyonyasambhaavaat" is the cause of Kriya Shankar Vyadhi SankarLeen dosh Sham vyafi


  • व्याधि संकर
  • क्रिया संकर
  • लीन दोष
  • साम व्याधि


Thursday, 14 May 2020

KayaChikitsa काय चिकित्सा Question and Answers- Ayurveda Quiz


KayaChikitsa काय चिकित्सा Question and Answers- Ayurveda Quiz in Hindi


Q:- Leukoterine antagonists are mainly useful for the management of?


  1. Oedema
  2. Bronchial asthma
  3. Cardiac disease
  4. Peptic ulcer


Q:- एक मास तक शिलाजीत का सेवन गोमूत्र के साथ किए जाने का निर्देश किस व्याधि की चिकित्सा में किया जाता है..? Shilajeet along with gomutra for 1 month is indicated in which disease..?





  1. ग्रहणी Grahni
  2. अर्श Arsh
  3. कुम्भ कामला Kumbh kamla
  4. प्रवाहिका Pravahika


Q:- निम्न मे से कौन सा लक्षण ज्वर मुक्त का नहीं है? Which among the following is not a jwar mukta lakshan?





  1. शिरो लघुत्व Shiro laghutva
  2. स्वेद Sweda
  3. मुखपाक Mukhapaka
  4. क्लम Klama


Q:- आयुर्वेद मतानुसार निम्नलिखित किस उपद्रव के उपस्थित होने पर उदर रोगी " अचिकित्स्य" माना गया है? According to Ayurveda, on presence of which Updrav in udara rogi, he is considered as " Achikitsiya"?





  1. ज्वर Jwar
  2. रक्तपित्त Raktapitta
  3. श्वास Swas
  4. कामला Kamala


Q:- निम्नलिखित में से कौन सा कारण, दोषों को शाखा से कोष्ठ में लेकर आने में उत्तरदायी है? Which among the following cause is responsible for movement of dosha from shakha to koshtha?




  1. व्यायाम Vyayam
  2. औष्णयं Aushnayam
  3. पाक Paaka
  4. मारुत द्रुतत्व Marut drutatva



Q:- A laboratory report of a patient mentions " Chronic hypercortisolism" what will be the diagnosis?



  1. Cushing's syndrome
  2. Conn's syndrome
  3. Addison's syndrome
  4. Down's syndrome



Q:- यदि वातिक गुल्म के रोगी में पित्त की अधिकता से संताप उत्पन्न हो जाए तो निम्नलिखित में से कौन सी चिकित्सा विधि का प्रयोग करना चाहिए? A patient diagnosed as vatika gulma suffers from fever due to aggravated pitta, which among the following should be used for treatment..?





  1. घृतपान Ghritpana
  2. सस्नेह अनुलोमन Sasneha anuloman
  3. विरेचन Virechan
  4. रक्तमोक्षण Raktamokshan


Q:- निम्न मे से किस व्याधि में "अगस्त्य हरीतकी" का प्रयोग निर्दिष्ट नहीं है? " Agastya haritaki" is not indicated in which of the following disease ?





  1. विषम ज्वर Visham jwar
  2. अर्श Arsh
  3. पाण्डु Pandu
  4. ग्रहणी Grahni


Q:- उदावर्त द्वारा ना होने वाली व्याधि _? Which is not caused due to udavarta?





  1. ज्वर Jwar
  2. वमन Vaman
  3. रक्तपित्त Raktapitta
  4. कुष्ठ Kushta


Q:- छिन्नमूला विदह्यन्ते _ न चास्ति रुक्" रक्तमोक्षण सिद्धांत है? "Chinnamoola vidhayante _ na chasti ruk" is Raktamokshan siddhant of ?





  1. व्रण Vrana
  2. विद्रधि Vidradhi
  3. पैत्तिक गुल्म Paittik gulma
  4. पैत्तिक उदररोग Paittik udararoga


Tuesday, 12 May 2020

Padarth Vigyan पदार्थ विज्ञान Question and Answers- Ayurveda Quiz

Padarth Vigyan पदार्थ विज्ञान Question and Answers- Ayurveda Quiz in Hindi


Q:- पंचमहाभूत सिद्धांत किस प्रकार का सिद्धांत है? Which kind of siddhant is Panchmahaboot siddhant?


  1. सर्वतंत्र सिद्धांत Sarvatantra siddhant
  2. परतंत्र सिद्धांत Partantra siddhant
  3. अधिकरण सिद्धांत Adhikarana siddhant
  4. साम्य वैषम्य सिद्धांत Samya vaishamya siddhant




Q:- रोग अवस्था में दोष दूष्य संयोग है?Which type of samyog is dosh dushya during rogavastha?

  1. समवायिकारण Samvayikaran
  2. असमवायिकारण Asamvayikaran
  3. निमित्त कारण Nimitta karan
  4. All of the above


Q:- भेल ने मन का स्थान माना है ? According to Acharya Bhel, what is the location of mann?

  1. शिर Shir
  2. हृदय Hridya
  3. इन्द्रियों में Indriya
  4. पाद तल Paad tal


Q:- आन्वीक्षिकी किस दर्शन का पर्याय है?Anvikshiki is synonym of which darshan?

  1. न्याय दर्शन Nyaya darshan
  2. सांख्य दर्शन Sankhya darshan
  3. वैशेषिक दर्शन Vaisheshika darshan
  4. योग दर्शन Yoga darshan


Q:- सतत और यथार्थ ज्ञान को कहते हैं।Satata and yatartha gyan are known as?

  1. प्रमाता Pramata
  2. प्रमेय Prameya
  3. प्रमाण Pramana
  4. प्रमा Prama


Q:- निम्न में से कौन सा स्मृति का कारण नहीं है? Which among the following is not a cause of smriti?

  1. अभयासात Abhayasat
  2. सादृश्यात Sadrishyat
  3. आवरणात् Avaranat
  4. सत्वानुबंधनात् Satvanubandhat


Q:- उद्भिज प्राणी का उदाहरण है?Which is an example of udbhij prani?

  1. कृमि Krimi
  2. पशु Pashu
  3. वीरबहूटी Veerbahuti
  4. कीट Keeta


Q:- आस्तिक दर्शन है -Which is astika darshan?


  1. जैन दर्शन Jain darshan
  2. मीमांसा दर्शन Mimamsa darshan
  3. चार्वाक दर्शन Charvak darshan
  4. बौद्ध दर्शन Bauddha darshan


Q:- गलत युग्म है -Which is a wrong combination?


  1. सत्कार्यवाद - वेदांत Satkaryavada- vedant
  2. क्षणभंगुरवाद - बौद्ध Kshanbhangurvad- bauddha
  3. वितर्कवाद - शंकराचार्य Vitarkavada- shankaracharya
  4. परिणामवाद - सांख्य Parinamvad - sankhya

Q:- कौन सा प्रमाण त्रिकाल ज्ञान नहीं देता है?Which praman does not gives knowledge of trikal?


  1. युक्ति Yukti
  2. अनुमान Anuman
  3. प्रत्यक्ष Pratyaksh
  4. आप्तोपदेश Aptopdesh

AgadTantra अगद तंत्र Question and Answers- Ayurveda Quiz

Agad Tantra अगद तंत्र Question and Answers- Ayurveda Quiz in Hindi

Q:- योग रत्नाकर में उपविषों की संख्या?Number of upvisha in yog ratnakar?


A. 6

B. 7

C. 9

D 11


Q:- सुश्रुत संहिता अनुसार विष किस गुण के कारण दुश्चिकित्स्य होता है ? According to sushruta samhita, vish is dushchikitsiya due to which guna ? 


1. लघु Laghu

2. रुक्ष Ruksha

3. व्यवायी Vyavayi

4. तीक्ष्ण Tikshna


Q:- Grievous injury is described in I.P.C.?


A. 319

B. 320

C. 321

D. 322


Q:- निम्न में से किस का प्रयोग विष चिकित्सा हेतु निर्दिष्ट नहीं है? Which of the following is not used for the treatment of poisoning?


1. हृदयावरण Hridyavaran

2. अवगाहन Avagahan

3. नस्य Nasya

4. अपकर्षण Apkarshan


Q:- The Curling's ulcer in burns usually found in?


1. Trachea

2. Duodenum

3. Lungs

4. Colon


Q:- अलर्क विष नाशक है?Which is alarka vish nashak?


1. जयपाल रस Jaypal ras

2. कुपीलु Kupilu

3. भल्लातक Bhallatak

4. लकुच Lakucha


Q:- स्नूही क्षीर का शोधन द्रव्य _? What is the shodhan dravya for snuhi?


1. गो दुग्ध Go dugdh

2. बबूलत्वक क्वाथ Babool twak kwath

3. चिञ्चा पत्र स्वरस Chincha patra swaras

4. आर्द्रक स्वरस Ardrak swaras


Q:- विष ग्रहण द्वारा कौन सा धातु /दोष सर्वप्रथम दूषित होता है ? Which dhatu / dosh gets dushit first by vish grahan?


1. पित्त Pitta

2. वात Vata

3. रक्त Rakta

4. मांस Mamsa


Q:- स्थावर विष की श्रेष्ठ चिकित्सा? What is the best treatment for sthavar vish?


1. विरेचन Virechan

2. वमन Vaman

3. रक्तमोक्षण Raktamokshan

4. दहन कर्म Dahan karma


Q:- चरक संहिता मतानुसार " संज्ञा स्थापन कर्म" किस विष वेग में निर्दिष्ट है? According to charak, " sangya sthapan karma" is indicated in which vish vega?


A. 6

B. 5

C. 4

D. 3

Saturday, 8 June 2019

स्वस्थवृत की परिभाषा,स्वस्थवृत का प्रयोजन, स्वास्थ्य के लक्षण |

स्वस्थवृत की परिभाषा,स्वस्थवृत का प्रयोजन, स्वास्थ्य के लक्षण | 


स्वस्थवृत की परिभाषा- 


स्वस्थवृत वह विज्ञान है जिसके द्वारा मनुष्यों का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य उन्नत होता है और स्वस्थ मनुष्य का स्वस्थ स्थिर रहता है | 

" It may be defined as the science of preserving and improving health."  

इसीलिए सुखमय जीवन जीने के लिए स्वस्थवृत का ज्ञान होना आवश्यक है | 
स्वस्थवृत दो शब्दों से मिलकर बना है स्वस्थ + वृत्त 
स्वस्थ का अर्थ निरोगी जीवन और वृत्त का अर्थ कर्म | इस प्रकार निरोगी जीवन जीने के लिए जो कर्म किये जाते है उसे स्वस्थवृत कहते है | 
स्वस्थवृत पालन से मनुष्य रोगों को दूर रख सकता है | 
इस स्वस्थ नियमों का पालन  करके मनुष्य आरोग्य रह सकता है | 


स्वस्थवृत प्रयोजन - 

आयुर्वेद विज्ञान के दो प्रयोजन है -
स्वस्थ मनुष्य के स्वास्थ्य की रक्षा करना 
रोगी व्यक्ति के रोग को दूर करना | 
इस स्वस्थवृत विज्ञान का ज्ञान दोनों स्वस्थ और रोगी लिए आवश्यक है | 
इस प्रकार स्वस्थवृत्त का प्रयोजन स्वस्थ व्यक्ति तथा रोगी के स्वास्थय की रक्षा करना है | 
आधुनिक चिकित्सा शास्त्र में स्वस्थवृत को Hygiene कहते है | अत Hygiene वह विज्ञान व् कला है जिसके द्वारा मनुष्यों का शारीरिक व् मानसिक स्वास्थ्य उन्नत होता है और मनुष्य का स्वास्थ्य स्थिर रहता है 


स्वस्थ मनुष्य के स्वास्थ्य के लक्षण - 


आयुर्वेद में दोष धातु और मलों की साम्यावस्था ( सामान्य अवस्था में रहना) 
को स्वास्थ्य कहते है | शरीर में दो प्रकार के दोष भेद है 
शारीरिक दोष , मानसिक दोष | 
शरीरिक दोषों में वात, पित्त, कफ तीन दोष है और मानसिक दोषों में रज, तम दो दोष है | 
इस प्रकार जिस मनुष्य में यह दोनों दोष ठीक प्रकार से काम क्र रहे हों, शरीर में अग्नि कर्म और पाचन कर्म तथा अन्य शारीरक क्रियाएं ठीक प्रकार से हो रहीं हो, जिस व्यक्ति का मन और इन्द्रियां प्रसन्न हो , धातुओं का निर्माण और पोषण तथा मलों की उत्पत्ति तथा निकास ठीक से हो रहा हो, ऐसे व्यक्ति को स्वस्थ पुरुष माना जाता है | 
इसीलिए स्वास्थ्य केवल रोग और शारीरिक कमजोरी से रहित होना नहीं बल्कि शरीर, मन और वातावरण की शुद्धि होना भी माना जाता है | 


Thursday, 10 January 2019

शरीरोपक्रम- शरीर की व्याख्या, शरीर ज्ञान प्रयोजन |

शरीरोपक्रम- शरीर की व्याख्या, शरीर ज्ञान प्रयोजन | 


शरीर परिचय -


आयुर्वेद आयु का विज्ञान है | " शीर्यते इति शरीरम " अर्थात जिसका प्रतिक्षण क्षय होता है उसे शरीर कहते है | आयु का विज्ञान होने के कारण इसके दो मुख्य उद्देश्य है -

  1. स्वस्थ मनुष्य के स्वास्थ्य की रक्षा करना | 
  2. रोगी के विकारों को शांत करना | 

इन दोनों उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए हमें शरीर के प्राकृतिक स्वरूप का ज्ञान होना आवश्यक है | रस, रक्त आदि धातुओं, त्रिदोषों और अंगों का ज्ञान ही शरीरिक ज्ञान है | 
मानव शरीर एक गूढ़ यंत्र के समान है शरीर का एक एक अंग यंत्र के पुर्जों के समान ही कार्य करता है | शरीर एक ऐसा यंत्र है जो दिनभर काम करने के बाद कुछ अंगों को तो निंद्रा के रूप में विश्राम देता है पर शरीर में कितने ही ऐसे अंग है जो जीवन पर्यन्त बिना थके क्रियाशील रहते है | इन अंगों में काम करते समय जो विकार पैदा होते है उन्हें हम यम, नियम, भैषज या शल्य के द्वारा दूर कर सकते है | 


शरीर शब्द की व्याख्या - 


जीवित और मृत दोनों ही अवस्थाओं में इस पंचमहाभूतों के समुदाय से निर्मित पदार्थ को शरीर कहा जाता है और दोनों ही अवस्थायें चिकित्सा शास्त्र में महत्वपूर्ण है | 
मृत शरीर का शवच्छेदन करके शरीर के विभिन्न अंगों का ज्ञान प्राप्त किया जाता है | जिसके आधार पर ही जीवित प्राणी के शरीर के अंगों का ज्ञान होता है | शरीर की चिकित्सा चेतना धातु ( आत्मा ) के साथ रहने तक ही की जाती है | 
इस प्रकार चेतना तत्व युक्त पांचभौतिक शरीर जिसमें त्रिदोष, सात धातु, जठराग्नि और त्रिमल ये सभी समान रूप से ठीक प्रकार से कार्य करते है उसे ही शरीर के नाम से जाना जाता है | 


शरीर ज्ञान का प्रयोजन -


  1. शरीर का ज्ञान होना आयुर्वेद शास्त्र की दृष्टि से एक चिकित्सक के लिए अति ज़रूरी है | 
  2. शरीर में विकार पैदा होते है इस लिए विकृति के ज्ञान के लिए प्राकृति का  ज्ञान ज़रूरी है जो शरीर ज्ञान से प्राप्त होता है | 
  3. स्थूल शरीर के ज्ञान से पहले सूक्ष्म शरीर का ज्ञान होना आवश्यक है 
  4. शरीर के अंग स्वस्थ अवस्था में कैसे काम करते है और विकार की स्थिति में कैसे काम करते है इसका ज्ञान होना ज़रूरी होता है | 
  5. किसी भी दोष, धातु, मल, अवयव की पंचभौतिक रचना का ज्ञान करने के लिए शरीर का ज्ञान होना अति आवश्यक है | 
  6. शरीर में किस स्थान पर किस प्रकार का विकार पैदा हुआ है और किस अंग विशेष को प्रभावित करता है इन सबका ज्ञान शरीर द्वारा ही किया जाता है | 
  7. सर्जरी की दृष्टि से भी शरीर का ज्ञान होना ज़रूरी होता है | 
  8. चिकित्सा शास्त्र की दृष्टि से मृत देह का ज्ञान होना भी अति आवश्यक है  


    

Friday, 14 December 2018

षडङ्गपानीय का परिचय, परिभाषा, निर्माण विधि का ज्ञान। Shadangapaaneey

TOPIC- 6 
विभिन्न औषध कल्पो का परिचय, परिभाषा, निर्माण विधि का ज्ञान। 

(1)   षडङ्गपानीय 

परिभाषा 


यह उशीर अदि छः द्रव्यों को जल में मिलाकर उबालकर शीतल करके ज्वरजन्य, पिपासा की शांति के लिए दी जाने वाली पानीये कल्पना है। 


द्रव्य 

1) उशीर ( खस ) = 2 ग्राम           
2) नागरमोथा = 2 ग्राम 
3) सुगन्धबाला = 2 ग्राम 
4) शुण्ठी = 2 ग्राम 
5) रक्तचंदन = 2 ग्राम 
6) पर्पट ( पित्तपापड़ा ) = 2 ग्राम 

इन सभी द्रव्यों को यवकूट चूर्ण करके 64 तोले जल में उबाल ले। फिर छानकर मिटटी के या स्टेनलेस स्टील के पात्र में ठंडा होने के लिए रख दे। ठंडा होने के बाद इसका सेवन करना चाहिए। 

मात्रा - 4 से 8 तोले की मात्रा दिन में 4 से 6 बार।

उपयोग - 

इसका उपयोग दाह, तृष्णा, पिपासा और ज्वर तथा अन्य पितज विकारों में किया जाता है। 




स्नेह कल्पना, निर्माण विधि का ज्ञान। स्नेहसिद्धि के लक्षण एवं सामान्य मात्रा Sneh kalpana,

TOPIC: 3 
स्नेह कल्पना, निर्माण विधि का ज्ञान। स्नेहसिद्धि के लक्षण एवं सामान्य मात्रा । 

स्नेह कल्पना

शरीर में वात दोष के कारण व्याधि उत्पन्न होती है। इसलिए वात दोष की शांति के लिए स्नेह कल्पना या स्नेह पाक उत्तम मानी गयी है। चिकित्सा में प्रयोग होने वाले घृत - तैल आदि स्नेह मूर्च्छना के बाद कल्क-कवाथ, जल, दुग्ध आदि द्रवो के साथ मिलकर किसी पात्र में डालकर आग पर जो पाक किया जाता है उसको हम स्नेह पाक कल्पना कहते है । 


स्नेह सिद्धि की सामान्य परिभाषा - 


जब स्नेह में जल का अंश पूरी तरह नष्ट हो जाये तो उसे मूर्च्छन अवस्था कहते है। उसके बाद जिस द्रव्य की स्नेह कल्पना तैयार करनी हो तो उसका चूर्ण या कल्क उस स्नेह द्रव्य में डालकर उसको आग पर पाक करना चाहिए । इस प्रकार स्नेह सिद्धि होने पर आग से उतार कर डिब्बे में भरकर सुरक्षित रखा जा सकता है ।

स्नेह के प्रकार - 

(1) घृत  
(2) तैल 
(3) वसा 
(4) मज्जा 

निर्माण विधि का ज्ञान -

स्नेह कल्पना तैयार करने के लिए औषधि द्रव्य के कल्क से स्नेह को चार गुना ज्यादा लेना चाहिए । जैसे कि द्रवो से मिला कल्क 16 तोला हो तो स्नेह 64 तोला लेना होता है । जल, दूध, कवाथ, स्वरस आदि से स्नेह चार गुना मात्रा में लेना होता है ।

स्नेह पाक के सामान्य नियम - 

1) धीमी आंच पर स्नेह मूर्च्छन करे ।
2) औषधियुक्त स्नेहकल्पना को उबलने से पहले आंच से उतार कर  थोड़ा ठंडा होने दे नही तो स्नेह में उबाल आने पर आग लग सकती है ।
3) मूर्च्छना करने से स्नेह की दुर्गन्ध वह आमदोष खत्म हो जाते है । और औषध द्रव्य से सुगंध आने लगती है ।    
       
स्नेह पाक के प्रकार 

(1) मृदु स्नेहपाक 
(2) मध्य स्नेहपाक 
(3) खर स्नेहपाक

मृदु स्नेहपाक - जब औषध का कल्क घी में पककर गोंद की तरह हो जाये और जल का अंश खत्म हो जाये उसे मृदु स्नेहपाक कहते है इसका प्रयोग वस्तिकर्म तथा पीने के लिए किया जाता है ।

मध्य स्नेहपाक - जब औषधि का कल्क पककर हलवे जैसा गाढ़ा हो जाये और जल का अंश समाप्त हो जाये तथा कल्क की वर्ति बनने लगे उसको 
मध्य स्नेहपाक कहते है । इसका प्रयोग नस्य कर्म हेतु किया जाता है । 

खर स्नेहपाक - जब औषधि का कल्क पककर हाथ से वर्ति बनाने पर वर्ति बन जाये तथा पुनः टुकड़े टुकड़े होकर गिरने लगे और स्नेह से दग्ध पाक जैसे गन्ध आने लगे उसको खर स्नेहपाक कहते है । इसका प्रयोग मालिश के लिए किया जाता है । 

स्नेह सिद्धि के लक्षण 

1जिस कल्क को स्नेहसिद्ध करते है उसको हाथ की अंगुलियों में लेकर यदि उसकी वर्ति बन जाये तो स्नेह को सिद्ध समझना चाहिए । 

२) औषधि कल्क मिश्रित स्नेह को चमच से आग पर डालने से चट-चट शब्द की आवाज नही आती ।  
3) तैल पाक के समय तैल के पात्र में झाग उत्पन ना होना और घृत पाक के समय घृतपात्र में फेन का शांत हो जाना स्नेहसिद्धि का लक्षण है । 
4) सुगंध, वर्ण, और रास की उत्पति होना यही स्नेहपाक का प्रमुख लक्षण मन गया है ।  
इस प्रकार स्नेह कल्पना के अंतर्गत औषधि सिद्ध घृत, औषधि सिद्ध तैल,  अन्य औषधिद्रव्यों को स्नेहसिद्ध किया जा सकता है । 

सामान्य मात्रा 

1) स्नेह सिद्धि हेतु औषधि कल्क से चार गुना घृत-तैल 
2) स्नेह से चार गुना ज्यादा द्रवद्रव्य ( स्वरस, कवाथ, हिमादि )लेना होता है। 


हिम कल्पना एवं फाण्ट कल्पना और उनकी मात्रा Him kalpana aur phaanta kalpana

हिम कल्पना  एवं फाण्ट कल्पना और उनकी  मात्रा ।


हिम कल्पना : 

इस कल्पना में द्रव्य का यवकूट चूर्ण कर मिट्टी की हांड़ी में गरम जल डालकर पूरी रात भिगोकर रख दे। और सुबह इन द्रव्यों को हाथ से अच्छी तरह मसलकर कपड़े से छान कर बर्तन में रखा जाता है। इसको हिम या शीत कल्पना कहते है। इस कल्पना में जल की मात्रा औषधि द्रव्य से  6 गुना ज्यादा होती है जैसे 4 तोला द्रव्य में 24 तोले जल ।

हिम की मात्रा :  2 पल = 8 तोला 

फाण्ट कल्पना :

मिट्टी की एक हांड़ी में 16 तोले जल को उबाले । जब जल उबलने लगे तो उसमे 4 तोला  मृदु द्रव्यों का यवकूट चूर्ण डालकर अच्छी प्रकार ढक कर चूल्हे से उतार कर ठंडा होने के लिए रख दे । ठंडा होने के बाद हाथ से मसलकर वस्त्र से छानकर रोगी को पीने को दें। इस कल्पना को फाण्ट कहते है। 

मात्रा :  2 पल = 8 तोला । 

कवाथ कल्पना तथा मात्रा Kvath kalpana

कवाथ कल्पना तथा मात्रा 

कवाथ कल्पना:  

शुष्क अथवा गीले द्रव्यों को यवकूट कर आवश्यकता अनुसार जल में उबाल कर छानने के बाद जो औषधि तैयार  होती है। उसे कवाथ कहते है। 

कवाथ में जल की मात्रा: 

मृदु औषधि द्रव्य में  चार गुना जल। 
कठिन औषधि द्रव्य में आठ से 16 गुना जल। 

कवाथ की मात्रा:  एक पल = 4 तोला 

कवाथ में प्राक्षेप द्रव्य : 

मिश्री की मात्रा - वातज रोग में 1/4 भाग, 
पित्तज रोग में 1/6 भाग, 
कफज रोग में 1/8 भाग । 
हींग, त्रिकटु, गुग्गल और भुना जीरा का चूर्ण 3 ग्राम 
दूध, गुड़, घृत की मात्रा एक कर्ष = 1 तोला। 


कल्क कल्पना तथा मात्रा,कल्क में प्रक्षेप द्रव्य Kalk kalpana

कल्क कल्पना तथा मात्रा,कल्क में प्रक्षेप द्रव्य-

कल्क कल्पना

कल्क को पेस्ट भी कहा जाता है ताज़ा औषधि हो तो शिलपिष्ट करके कल्क तैयार किया जाता है। शुष्क द्रव्य हो तो  उसके चूर्ण में आवश्यकता अनुसार जल मिलाकर कल्क तैयार करते है। अर्थात जल, स्वरस आदि के साथ शुष्क औषधि द्रव्य के चूर्ण को पीस कर बनाया गया पिण्ड कल्क कहलाता है।

कल्क  मात्रा 

1 कर्ष = 1तोला, तीक्ष्ण द्रव्यों के कल्क की मात्रा 5 से 6 gm 

कल्क में प्रक्षेप द्रव्य : 

कल्क सेवन करते समय शहद तथा घृत की मात्रा कल्क से दोगुनी, 
मिश्री और गुड़ सामान मात्रा में,
स्वरस दूध और जल चार गुना मात्रा  में लेने चाहिए । 


स्वरस कल्पना और स्वरस की मात्रा Svaras kalpana, svaras maatra

स्वरस कल्पना और स्वरस की मात्रा- 



स्वरस कल्पना: 

किसी भी द्रव्य का अपना जो रस होता है। उसको स्वरस कहा जाता है अर्थात भूमि से तुरंत उखाड़ी गई हरी औषधि को निचोड़ या दबाकर जो रस निकलता है। उसको स्वरस कहते है। जैसे कि तुलसी पत्र का स्वरस । कुछ द्रव्य ऐसे होते है जिनका स्वरस साधारण विधि से नही निकाला जा सकता, उन द्रव्यों का स्वरस निकालने के लिए जिस विशेष विधि का प्रयोग किया जाता है। उसको पुटपाक विधि कहते है । जैसे कि वासा पत्र , निम्बपत्र , विल्वादी पत्र । 




स्वरस मात्रा (DOSE):  

1/2 पल = 2 तोला = 20 ML 

पुटपाक स्वरस की मात्रा = 1 पल = 4 तोला = 40 ML  
स्वरस एक गुरु कल्पना है इसलिए ताज़ा औषध द्रव्यों की मात्रा 20 ML सूखे द्रव्यों की मात्रा 40 ML तथा अतितीक्ष्ण द्रव्यों का स्वरस 10 ML देना चाहिए ।


कषाय की परिभाषा, कषाय योनियां Kashaay ki paribhaasha

कषाय की परिभाषा, कषाय योनियां- 



कषाय की परिभाषा:


जिस द्रव्य का सेवन करने से गले में कर्षण (खरखराहट) होती है । उस द्रव्य को हम कषाय द्रव्य कहते है । कषाय का अर्थ द्रव्य का असली रूप नष्ट कर उसको खाने के योग्य बनाना । जैसे- तुलसी के पत्र का रस प्राप्त करने के लिए उसके मूल स्वरूप को नष्ट करना पड़ता है अर्थात तुलसी पत्र को पीस कर उसका रस प्राप्त किया जाता है ।




कषाय योनियां: 


हर तरह के कषाय लवण रस को छोड़ कर बाकी के पांच रसों से बनते है ।

                     
  • (1) मधुर कषाय                      
  • (2) अम्ल कषाय
  • (3) कटु कषाय                     
  • (4) तिक्त कषाय 
  • (5) कषाय कषाय 





Thursday, 13 December 2018

पंचविध कषाय कल्पना का सामान्य प्रचलित ज्ञान तथा परिभाषा Panchavidh kashaay kalpana

TOPIC: 2
पंचविध कषाय कल्पना का सामान्य प्रचलित ज्ञान तथा परिभाषा 



परिभाषा : किसी भी द्रव्य को चाहे वो आहार द्रव्य हो या औषधि द्रव्य हो उनको हम सीधा प्रयोग नही कर सकते। इस लिए जिस विज्ञान में इन द्रव्यों को प्रयोग करने के काबिल बनाया जाता है। उस विज्ञान को भेषज्य कल्पना विज्ञान कहते है। 

पंचविध कषाय कल्पना:

औषध द्रव्य या आहार द्रव्य का जिन विधियों के द्वारा प्रयोग किया जाता है वह पंचविध कषाय कल्पना कहलाती है। 
वह पंचविध कषाय कल्पना पांच प्रकार की मानी गई है ।


यह पांच प्रकार की कल्पनायें पांच रस द्रव्यों से तैयार की जाती है ।
जैसे कि : मधुर , अम्ल , लवण , कटु , तिक्त , कषाय रस । continued....


प्राचीन एवं आधुनिक मान का तुलनात्मक सामान्य ज्ञान Pracheen, aadhunik maan ka tulanaatmak gyaan

प्राचीन एवं आधुनिक  मान का तुलनात्मक  सामान्य  ज्ञान 



तीनों आचार्य चरक, शुश्रुत, और शाङ्गधर  ने अपने अलग- अलग ढंगो से मान का वर्णन किया है परंतु अंत में नतीजा एक ही निकलता है जिसके अनुसार रति और ग्राम  एक सामान माने गए है । जैसे कि  सुश्रत  और शाङ्गधर ने 6 रति का एक माषक  माना है और 4 माषक का एक शान  माना है । इस प्रकार चरक ने 12 माशे का एक कर्ष माना है जिसमे रति की गिनती 96 है  दूसरी तरफ सुश्रत और शाङ्गधर ने 16 माशे का एक कर्ष माना है परन्तु  रति इसमें भी 96 ही होती है एक रति 62 ग्राम की मानी गयी है




चरक अनुसार                                                               सुश्रत अनुसार




8 रति = 1 माशा (1ग्राम, 1000mg)                                    6 रति = 1 माशा (1ग्राम, 1000mg)

3 माषक = 1 शान = 24 रति                                             4 माषक = 1 शान = 24 रति
2 शान = 1 कोल = 48 रति                                               2 शान =1 कोल = 48 रति
2 कोल = 1 कर्ष = 96 रति                                                2 कोल =1 कर्ष = 96 रति (12 ग्राम )= 1 तोला  

मान की उपयोगिता , शुष्क एवं आर्द्र, द्रव्यों का ग्रहण नियम Maan ki upayogita,

मान की उपयोगिता , शुष्क एवं आर्द्र, द्रव्यों का ग्रहण नियम ।




मान की उपयोगिता - : 

आयुर्वेद में औषधियों के निर्माण से लेकर उसके सेवन तक पथ्य अनुपान सभी कार्यों में मान का महत्त्व्पूर्ण स्थान है द्रव्यों का प्रयोग मान के बिना निष्फल हो जाता है किसी भी औषध का प्रयोग मान के बिना नही हो सकता अगर औषधि कम या ज्यादा मात्रा में दे दी जाये तोह उसके परिणाम घातक हो सकते है आयुर्वेद में जितनी भी कल्पनायें है उनका निर्माण करने के लिए मान को ठीक-ठीक प्रयोग में लाना चाहिए । जैसे ; वटी , चूर्ण ,आसव और आरिष्ट आदि ।

मान के कम या ज्यादा होने से यह कल्पनायें प्रयोग करने के योग्य नही रह जाती विभिन्नऔषधियों को अधिक से अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए उनमे घटक द्रव्य उचित मात्रा तथा उचित मान में ही मिलाने चाहिए, व्यादि ग्रस्त तथा स्वस्थ मनुष्य को औषधि द्रव्य तथा भोजन आदि मान के अनुसार ही दिया जाना चाहिए ।
इस प्रकार वैज्ञानिक एवं सामाजिक दृष्टि से हमारे जीवन में मान का विशेष महत्व है ।

शुष्क एवं आर्द्र, द्रव्यों का ग्रहण नियम: 

आयुर्वेद में औषध द्रव्यों से तैयार  की जाती है यह द्रव्य शुष्क एवं आर्द्र होते है औषधि बनाने के लिए शुष्क द्रव्य आर्द्र द्रव्यों के मुकाबले आधे लेने चाहिए । क्योंकि शुष्क द्रव्य गुरु और तीक्ष्ण वीर्य होते है इस लिए इनकी मात्रा आद्र द्रव्यों से आधी ली जाती है औषधि निर्माण हमेशा शुष्क द्रव्य ही लेने चाहिए क्योंकि इन्ही से औषधि उपयोगी बनती है । परन्तु यदि कहीं आद्र द्रव्य लेने पड़े तो उनको दोगुनी मात्रा में लेना चाहये । इसके इलावा कुछ द्रव्य ऐसे है जिनको हमेशा ताज़ा ही लिया जाता है किन्तु उसमे दोगुनी मात्रा नही लेते जैसेकि:- वासा, शतावरी, कुटज, प्रसारणी, गुडूची इत्यादि ।



मान की परिभाषा ,द्र्व्यमान एवं पय्यमान की परिभाषा Maan ki paribhasha, maan ke bhed,

मान की परिभाषा ,द्र्व्यमान एवं पय्यमान की परिभाषा                                                                                                             

मान की परिभाषा : जिससे तोला या मापा जाता है उसे मान कहा जाता है

मान के ज्ञान की आवश्यकता : मान के बिना किसी भी मनुष्य चाहे वो बीमार हो या वह स्वस्थ हो उसे कोई भी द्रव्य नही दिया जा सकता,क्योंकि किसी भी आहार द्रव्य या औषधि के निर्माण के लिए जिन द्रव्यों का प्रयोग किया जाता है वह उचित मात्रा में होने चाहिए, इस लिए मान का ज्ञान होना आवशयक है ।

 मान के भेद : आचार्य चरक ने मान के दो भेद माने है ।

                       १) मागध मान
                       २) कालिंग मान


इनमें से मागध मान श्रेष्ठ माना गया है । इसके इलावा मान के तीन भेद और माने गये है ।

१) पौत्तव मान  {Measurement of weight} : यह केवल ठोस द्रव्यों को तोलने के काम आता है

२) द्र्व्य मान{ Measurement of capacity} : केवल द्रव पदार्थ के माप के लिए पात्र विशेष जिससे द्रव पदार्थ मापा जाये उसे द्रव्यमान कहते है ।

३)पय्यमान {Measurement of length }: यह केवल द्रव्य पदार्थो की लंबाई, चौड़ाई, मोटाई मापने के काम आता है ।

CONTINUED...

लवणाम्ल का परिचय, मारक मात्रा, और चिकित्सा का वर्णन Lavanaaml ka parichay

Topic - 10 
लवणाम्ल का परिचय, मारक मात्रा, और चिकित्सा का वर्णन -


लवणाम्ल - HYDROCHLORIC ACID-


परिचय-

शुद्ध लवणाम्ल वर्ण रहित गैस पदार्थ है इसका रासायनिक सूत्र HCLहै | यह दाहक विष है |इसकी एक प्रकार की गन्ध होती है जिसके कारण क्षोभ होता है यह जल में अत्यंत घुलनशील है | औषधियों में प्रयोग होने वाला लवणाम्ल एक वर्ण रहित तरल पदार्थ होता है | अन्य अम्लों की अपेक्षा इसकी क्रिया मन्द होती है | इसका प्रयोग विभिन्न प्रकार की गैस बनाने में रंग बनाने में, अक्षरों को मिटाने के लिए किया जाता है | 


विषात्मक प्रयोग - 

दुष्ट प्रकृति के लोग ईर्ष्यावश इसका प्रयोग धोखे से चेहरे व शरीर पर इसे छिड़क देते है | जिससे वहां की त्वचा जल जाती है और शोथ व वेदना होती है | आत्महत्या के लिए इसका प्रयोग बहुत कम किया जाता है | 


मारक मात्रा और काल -

इसकी घातक मात्रा 100 ml से 150 ml मानी गई है | इसका मारक काल 12 से 24 घंटे तक माना गया है | 


विषाक्त लक्षण - 

इसके प्रयोग करने पर त्वचा व वस्त्र पर हल्का भूरे रंग का दाग पड़ जाता है | चमड़ी में शोथ एवं व्रण पैदा हो जाते है | इसको पी लेने के बाद अत्यधिक लालास्राव होता है | आक्षेप, प्रलाप, पक्षाघात इस अम्ल के विशेष लक्ष्ण होते है | मसूड़ों में शोथ पैदा हो जाता है तथा दांत हिलने लगते है | 


चिकित्सा - 

शरीर के जिस भाग में इसका प्रयोग किया जाता है वहां रुई या सूती कपड़े की सहायता से साफ़ जल से धोना चाहिए | इसके बाद घी आदि स्निग्ध पदार्थ लगा देना चाहिए ताकि दाह और पीड़ा शांत हो जाये | यदि व्यक्ति ने इस अम्ल को पी लिया हो तो उसको तुरंत नवनीत घी, जैतून तैल आदि मृदु स्निग्ध द्रव पीने को देना चाहिए | इसके बाद दाह शमन के लिए चूना लेकर उसको पानी में मिलाकर उसका प्रयोग करना चाहिए | रोगी को बर्फ चूसने को देनी चाहिए जले हुऐ अंगों पर दाह शामक औषधि प्रयोग करनी चाहिए |




Wednesday, 12 December 2018

गन्धकाम्ल का परिचय, मारक मात्रा, लक्षण और चिकित्सा का वर्णन Gandhkaaml ka parichay,

Topic - 10 
गन्धकाम्ल का परिचय, मारक मात्रा, लक्षण और चिकित्सा का वर्णन - 

गन्धकाम्ल  - SULPHURIC ACID-

परिचय- 


यह एक दाहक विष है जिसका रासायनिक सूत्र H2SO4 है जोकि रंगहीन द्रव के रूप में होता है | इसकी किसी प्रकार की गन्ध नहीं होती है और वायु में खुला छोड़ देने से इसमें से किसी प्रकार का कोई धुँआ नहीं निकलता, इस अम्ल को जल में मिलाने से यह उष्ण हो जाता है | इसका विशिष्ठ घनसत्व 1.84 होता है | 


सामान्य प्रयोग -


गंधकाम्ल एक बहुत उपयोगी द्रव्य है | इसका उपयोग रासायनिक द्रव्यों के निर्माण में, खाद बनाने में, पेट्रोलियम के शोधन में किया जाता है | ऐसा माना जाता है कि जिस देश में जितना गंधकाम्ल का उपयोग किया जाता है वह देश उतना ही समृद्धिशाली होता है | 


विषात्मक प्रयोग -


यह शरीर के  जिस अंग पर लगता है वहां पर विस्फोट, व्रण, दाह और वेदना पैदा कर देता है | त्वचा, वस्त्र, काग़ज़, लकड़ी या शरीर के अंग पर गंधकाम्ल गिरने पर वस्त्र और त्वचा झुलस जाते है | 


मारक मात्रा और घातक काल  -


गंधकाम्ल की घातक मात्रा 60 बून्द मानी गई है | सांद्र अम्ल = 50 से 100 ml, तनु अम्ल = 30 से 40 dl, समान मात्रा में जल मिलाने पर इसका घातक काल 4 से 24 घंटे का माना जाता है |


विषाक्त लक्षण -


शरीर के बाहरी अंगों पर लगने पर वह जल जाती है | त्वचा जलने पर तनाव होने लगता है | यदि इस विष का पान किया जाता है तो जीभ सफेद और गहरे भूरे रंग की हो जाती है | मुख अंदर से जल जाता है जिसके कारण दाह और पीड़ा होने लगती है | आमाशय व आंत्र में शोथ हो जाता है अत्यंत पीड़ा होती है और इनमें छिद्र हो जाते है और रक्त बहने लगता है |


चिकित्सा -


इस अम्ल का प्रयोग शरीर की त्वचा पर किया गया है तो जल्दी से रुई से या सूती कपड़े से पोंछ देना चाहिए फिर साफ़ जल से उसे धो देना चाहिए | फिर उस पर घी, जैतून या एरंड का तेल, ग्लिसरीन आदि स्निग्ध पदार्थ लगा देना चाहिए | इसके कारण दाह व पीड़ा का नाश हो जाता है | जिस रोगी ने गंधकाम्ल को मुख से प्रयोग किया हो तो उसको सबसे पहले दाह शमन  के लिए मृदु व स्निग्ध द्रव पिलाना चाहिए | इसके लिए नवनीत घी, जैतून तेल पीने को देना चाहिए | इसके इलावा 250 gm दूध में एक अंडे का सफेद भाग, कोयले का चूर्ण दो से तीन चम्मच और दो चम्मच घी मिलाकर पिलाना चाहिए | इसके इलावा टैनिक एसिड का प्रयोग भी प्रतिविष के रूप में किया जाता है | 



Saturday, 8 December 2018

शोरकाम्ल का परिचय, मारक मात्रा, लक्षण और चिकित्सा का वर्णन Shorkaaml ka parichay,

Topic - 10 
शोरकाम्ल का परिचय, मारक मात्रा, लक्षण और चिकित्सा का वर्णन -

शोरकाम्ल - NITRIC ACID-


परिचय - 

शोरकाम्ल दाहक विष है जिसे Nitric Acid कहा जाता है | इसका रसयानिक सूत्र HNO3 है | विशुद्ध शोरकाम्ल स्वच्छ , वर्ण रहित द्रव पदार्थ है | वायु में खुला छोड़ने पर इसमें से रंग रहित धुआँ निकलता है जिससे दम घुटने वाली दुर्गन्ध आती है | यह प्रबल भस्मकारक है | यह सोडियम प्लेटिनम स्वर्ण को छोड़कर बाकी धातुओं को अपने में विलीन कर लेता है| 


सामान्य प्रयोग - 

इसका प्रयोग लैब में विभिन्न प्रकार के acid और गैस के निर्माण के लिए किया जाता है | इसके इलावा धातु निर्माण में भी इसका प्रयोग किया जाता है | धातुओं के मिश्रण में धातु को अलग करने के लिए इसका प्रयोग करते है | 


मारक मात्रा और काल  - 

शोरकाम्ल की घातक मात्रा 100 ml मानी जाती है या 120 बूंद | इसका घातक काल 10 से 24 घंटे माना गया है | 


विषाक्त लक्षण-

इसके त्वचा के संपर्क में आते ही यह त्वचा को जला देता है और उस स्थान पर दग्ध वर्ण बन जाता है जिससे पीड़ा अधिक होती है और त्वचा में खिंचाव आ जाता है | इसके धुंए को सूंघने से सांस नली में शोथ हो जाता है | जिसके कारण साँस लेने में दिक्क़त होती है | 
इसको मुख से सेवन करने से होंठ और मुँह का अंदरूनी भाग जल जाता है और श्वेत वर्ण का दिखाई देता है दांतो का रंग पीला हो जाता है | पेट में जाकर यह सूजन कर देता है जिससे उदरशूल, अफारा आदि लक्षण होने लगते है | 


चिकित्सा - 

शरीर के बाहरी भाग पर इसका प्रभाव होने पर तुरंत उस हिस्से को जल से धो देना चाहिए फिर उस स्थान को अच्छी तरह साफ़ करके घी ,ग्लिसरीन का प्रयोग करना चाहिए | 
यदि व्यक्ति ने इसको पी लिया हो तो उसे जल्दी से मृदु ,स्निग्ध और दाहशामक औषधि पीने को देनी चाहिए इसके लिए घी, जैतून तेल और दूध का प्रयोग करना चाहिए | अम्ल के प्रभाव के शमन के लिए, कैल्शियम, मैग्नीशियम ऑक्साइड प्रत्येक 2-2 gm मिलाकर पिलाते रहें | इसके बाद 250 ml दूध और अंडे की सफेदी खाने को दे | बार - बार थोड़ी मात्रा में जलपान कराते रहें | दर्द के लिए मार्फीन का इंजेक्शन लगाते है |  



Thursday, 6 December 2018

आहार विष लक्षण, विरुद्ध द्रव्यों का सेवन Viruddh dravyon ka sevan

Topic -11 

आहार विष लक्षण, विरुद्ध द्रव्यों का सेवन | 


विरुद्ध द्रव्यों का सेवन- 


जिन द्रव्यों को परस्पर एक साथ मिलाकर खाने से या पीने से शरीर के अंदर जाकर विष वाला प्रभाव पैदा होता है उन द्रव्यों को विरुद्ध द्रव्य कहते है | अर्थात जिस द्रव्य को खाने से हमारे शरीर के अंदर के दोष अपने स्थान से उभर कर शरीर में ही फ़ैल जायें और बाहर नहीं निकले वे सभी आहार द्रव्य अहितकर होते है |  इसे ही विरुद्ध या वैरोधिक आहार कहा जाता है | इन द्रव्यों में कुछ द्रव्य परस्पर गुण विरुद्ध, कुछ संयोग विरुद्ध, कुछ संस्कार विरुद्ध और कुछ देश, काल, मात्रा आदि विरुद्ध होते है | 


1) गुण विरुद्ध - 


दो द्रव्यों के गुण विरुद्ध होने पर यदि इनको साथ में मिलाकर खाया जाता है तो वह गुण विरुद्ध होता है | जैसे - मछली और दूध दोनों के मधुर होने पर कफ की वृद्धि होती है | इसकी प्रकार दूध और कुल्थी का प्रयोग एक साथ करने से विपरीत प्रभाव देखने को मिलते है | 


2) संयोग विरुद्ध -


कुछ द्रव्यों को मिलाकर खाने से या एक को खाकर दूसरे को खाना संयोग विरुद्ध कहा जाता है | जैसे दूध के साथ अम्ल ( खट्टे ) द्रव्यों को खाने से यह दोषों का प्रकोप करते है जोकि स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है | सत्तू खाने के बाद जल का सेवन, लहसुन और मूली खाने के बाद दूध नहीं पीना चाहिए | 


3) संस्कार विरुद्ध - 


जिन वस्तुओं को पकाकर या गर्म करके खाने से हमारे शरीर की हानि होती है उनके संस्कार विरुद्ध कहा जाता है | जैसे दही को गर्म करके खाना संस्कार विरुद्ध होता है | यह शरीर में कई दोष पैदा करता है | इसी प्रकार गर्म किया हुआ शहद ज़हर के समान माना गया है | 


4) देश विरुद्ध - 


हर प्रदेश की जलवायु अलग अलग होती है उनकी विशेषताओं को ध्यान में न रखकर खाद्य पदार्थों का सेवन करना देश विरुद्ध कहलाता है | जैसे - मरुप्रदेश में रुक्ष व तीक्ष्ण द्रव्यों का सेवन और अनूप प्रदेश में स्निग्ध व शीत वीर्य द्रव्यों का सेवन हानिकारक होता है | 


5) काल विरुद्ध - 


ऋतु,  आहार, और काल के अनुसार हमारे शरीर में दोषों की स्थिति बदलती रहती है | इसको अनदेखा कर भोजन खाना काल विरुद्ध कहलाता है | जैसे - रात को सत्तू खाना , सर्दी में शीत और रुक्ष पदार्थों का सेवन करना तथा गर्मी के मौसम में कटु और उष्ण द्रव्यों का सेवन करना हानिकारक होता है | 


6) मात्रा विरुद्ध - 


शहद और घी को समान मात्रा में मिलाकर खाना मात्रा विरुद्ध कहलाता है| 


7) स्वभाव विरुद्ध - 


कुछ द्रव्य स्वभाव से गुरु और ना पचने वाले होते है | जैसे - मलाई, रबड़ी, दूध, गुड़ और बेसन के बने तले पदार्थ आदि स्वभाव विरुद्ध द्रव्य कहलाते है |  



Wednesday, 5 December 2018

आहार विष, लक्षण, आहार विषाक्ता उपचार Aahaar vish lakshan,

Topic- 11 

आहार विष, लक्षण, आहार विषाक्ता उपचार-


आहार विष-


यदि भोजन का युक्ति पूर्वक सेवन किया जाये तो यह रसायन का फल देता है | शरीर को बलशाली बनाता है, परन्तु यदि भोजन को अयुक्ति या ठीक ढंग से सेवन नहीं किया जाता है तो यह विष का रूप होकर प्राणों का नाश करता है और विशाद पैदा करता है | आधुनिक विद्वानों ने भी आहार विष को दो भागों में बांटा है - 
  1. जीवाणुजन्य 
  2. अजीवाणुजन्य  
जीवाणुजन्य- आहार को अगर खुला रखा है, ठंडा है, ज्यादा समय का बना हुआ है तो उस पर जीवाणु का संक्रमण हो जाता है जिसके कारण वह दूषित हो जाता है | यदि इस आहार को खाया जाता है तो व्यक्ति रोग ग्रस्त या विषाक्त हो जाता है | 

अजीवाणुजन्य- भोजन को अविवेक पूर्ण या ठीक ढंग से ना ग्रहण करने से अजीवाणुजन्य विषाक्ता होती है | जिन बर्तनों में भोजन पकाया जाता है कई बार यही बर्तन विषाक्तता पैदा करते है |  जैसे - तांबे के बर्तन में रखा हुआ दहीं विषाक्त ( जहरीला ) हो जाता है | 

आहार विष लक्षण-  


विष युक्त भोजन खा लेने से कुछ लोगों को कुछ नहीं होता, और कुछ व्यक्ति भयंकर रूप से रोग ग्रस्त हो जाते है | जीवाणुजन्य भोजन खाने से विष का प्रभाव देर से पैदा होता है, क्योंकि जीवाणु आँतों के अंदर पहुँच कर अपनी विषाक्तता पैदा करने में 12 घण्टे का समय लगाते है | परन्तु अजीवाणुजन्य विषाक्तता का आक्रमण भोजन खाने के बाद अचानक से ही होता है | इसके प्रभाव से रोगी के शरीर में कंपकपी पैदा हो जाती है, रोगी को ज्वर ( बुखार ) मिचली, वमन और उदर ( पेट ) में तीव्र (तेज ) पीड़ा, अतिसार आदि लक्षण प्रकट हो जाते है | रोगी निर्जीव और दुर्बल ( कमज़ोर ) महसूस करता है | भोजन की विषाक्ता होने से शरीर के जोड़ों में पीड़ा, पेट दर्द और आन्त्रियों में शोथ आदि लक्षण पैदा होते है | 

आहार विषाक्ता उपचार-  


यदि किसी मनुष्य को आहार खाने से विषाक्ता हो जाये तो सबसे पहले उस मनुष्य के पेट का धावन करना चाहिए | ऐनिमा के द्वारा आन्त्रियों को साफ़ करके मल के द्वारा विष को बाहर निकालना चाहिए | जब तक भोजन की विषाक्ता के लक्षण शांत नहीं हो जाते, तब तक रोगी को कुछ भी खाने के लिए नहीं देना चाहिए |